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बातों का मुद्दा...मुद्दे की बात

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Deepak Tiwari


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: Deepak Tiwari Deepak Tiwari

के द्वारा: Deepak Tiwari Deepak Tiwari

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

सिंह साहब नमस्कार, बात सही है कि मीडिया की ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और वह लोगों को प्रभावित भी करता है लेकिन वोट डालते वक्त कहीं न कहीं वोटर की मनोदशा अलग होती है और वह अपने विवेक से ही मतदान करता है( ऐसा मैने खुद महसूस किया है) सवाल ये भी है कि जो लोग पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं या जिन्हें गाड़ियों में पहुंचाया जाता है, उनमें से कितने लोग टीवी देखने का समय निकाल पाते होंगे और जो लोग टीवी देखते हैं या फिर सोशल नेटवर्किंग साईट्स में सक्रिय रहते हैं उनमें से कितने लोग पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं।ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल के मुद्दे पर आप से सहमत दरअल मेरा आशय भी वही था।

के द्वारा: Deepak Tiwari Deepak Tiwari

आदरणीय दीपक जी, एग्जिट पोल नहीं ओपिनियन पोल अभी चल रहा है. एग्जिट पोल तो वोट डालने के बाद वोट डालकर आने वाले से पूछे गए सवालों पर आधारित होते हैं. जब कई चरणों में चुनाव होते हैं तो एग्जिट पोल के नतीजे से अगला चरण प्रभावित हो सकता है ऐसा मानकर इसपर प्रतिबन्ध लगाय जा चुका है! सर्वे जनता को प्रभावित नहीं करते हैं ऐसी बात भी नहीं है. आज मीडिया एक ताकत है जो आम लोगों की धारणा बदलने में बहुत बड़ा रोल अदा कर रहा है. मीडिया की ही देन विश्व्नाथ प्रसाद सिंह थे. जो अपने पॉकेट में बोफोर्स तोप का सौदा लेकर घूमते थे और तीसरे मोर्चे के प्रधान मंत्री भी बन गए थे. इस बार कांग्रेस से आम जनता परेशां है इसलिए परिवर्तन तो होना है पर किस हद तक यह तो भविष्य बतायेगा.... आडवाणी फिर से ब्लॉग लिखने लगे हैं. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Deepak Tiwari Deepak Tiwari

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

जनमानस के गुस्से को समझें- राहुल गाँधी कांग्रेस का कहना है की राहुल गाँधी ने जनमानस के गुस्से को महसूस कर दागियों को बेदाग बनाने वाले अध्यादेश को वापिस लेने के लिए मजबूर किया। देश का जन-जन महंगाई,भ्रष्टाचार,आतंकवाद और अव्यवस्था से पीड़ित और आक्रोश में हैं। राहुल संवेदनशील बने और जनमानस के गुस्से को समझें और देश हित की बात करें तभी उन्हें मिस्टर क्लीन समझा जायेगा। भ्रष्ट और चोर सांसदों की खोलो पोल! मत देना भूलकर भी भ्रष्टों को वोट!! पतंजली योग पीठ में खिलें हैं फूल, स्वामी रामदेव भ्रष्टों को चटायेंगे धूल! मत करो इन भ्रष्टों पर इतबार करने की भूल, करना है इन भ्रष्टों का सर्वनाश मूल!! कृपया टिपणी करें----- आपकी एक वाह-नया लिखने की पैदा करती है चाह!!! आर एम मित्तल मोहाली

के द्वारा: mittal707 mittal707

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

के द्वारा: somanshsurya somanshsurya

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और साथ मिला लिया विजय बहुगुणा और हरकसिंह और कर दिया बंटा धार ! बहुगुणा अपनी रोटी इलाहाबाद में पका रहा था, और आगया उत्तराखंड को अपने कुकर्मों में लपेटने के लिए सारे प्रदेश को और लपेट ही लिया ! ये समय था उत्तराखंड गए उन हजारों यात्रियों को बचाने का जो बेचारे केदारनाथ, बद्री नाथ, जोशीमठ, रूद्र प्रयाग, गंगोत्री, यमनोत्री, में फसे पड़े थे ! भंयकर बाढ़ और बादल फटने से मची तबाई से हजारों सैलानी मौत के मुंह में चले गए ! बड़े नेता और उनके चमचे शासन की पताका लिए खिसक गए रह गए पीछे हजारों जिनमें कही तो भूख प्यास से मर गए ! १६ तारीख को देहरादून में सरकार को इस त्रादसी की खबर जा चुकी थी लेकिन उत्तराखंड सरकार के कानों में जून तक नहीं रेके और १९ तारीख को जाकर सेना और सुरक्षा कर्मियों की टुकड़ियां वहां पहुँची ! हरकसिंह मंत्री ने तो सारी हदें पार करके पीड़ितों के लिए सामग्री ले जाने वाले हेलीकाफ्टर से सारा सामान उतरवाकर स्वयं सवार होकर सैर सपाटे को निकल गया ! क्या इस अपने को इंसान कहने वाले को ऊपर वाला कभी माफ़ कर पाएगा ! आज पीड़ितों का हो न हो पर कल उनका होगा और इन दरिंदों का ....यह कहर इनपे कुदरत बार पाएगा ! बहुत सुन्दर लेख, तिवाडी जी !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: Deepak Tiwari Deepak Tiwari

राजनीती में जो लोग हैं उनकी महात्वाकांक्षा कितनी बड़ी है की ये नेता कब्र में पैर लटके हों फिर भी एक बार पी एम् की कुर्सी मिल जाये ऐसा सोचते हुए ही मरते भी हैं अडवानी भी अपने मन में यह इक्षा पाले बैठे हैं लेकिन अडवाणी जी शायद भूल रहे हैं की उनको प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर भाजपा एक चुनाव हार चुकी है अतः बेहतर होगा बीजेपी अब यह कहना शुरू करे की जब उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में बहुमत लाएगी उसके बाद ही उनकी पार्टी अपने घटक दलों के साथ मीटिंग एवं विचार विमर्श करने के बाद ही अपने नेता यानि अपने दल के किस नेता को पी एम् बनाएगी इस की घोषणा करेगी . बहुत हो गया पी एम् कौन बनेगा ? खेल खेलते हुए अब पार्टी एवं नेता यह घोषणा करें तो बेहतर होगा की अगला लोकसभा चुनाव वे किस मुद्दे को लेकर लड़ेंगे क्या जनहित भी कोई मुद्दा बनेगा ? इस बात की चर्चा अब बंद होनी चाहिए की प्रधानमंत्री कौन बनेगा .तिवारी जी को बधाई वर्तमान राजनीती पर एक अच्छा आलेख

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

तिवारी जी शायद आप भूल रहें हैं यह कांग्रेस की सरकार केवल सरकार में कैसे बने रहें गिनती के आंकड़े जो सरकार के लिए चाहिए वह कैसे पूरा होता रहे बस केवल यही सरकार की प्राथमिकता है क्यूंकि वह देख रही है की यहाँ की जनता मूक दर्शक है और छोटे - मोटे आन्दोलन करके चुप बैठ जाती है अतः जनता की परवाह तो सरकार को न कभी थी और न होगी हाँ सरकार में बने रहने के लिए अगर छोटा मोटा लाली पाप जनता को देना पड़े उसकी घोषणा भर कर देती है देने की तो जरुरत भी नहीं क्यूंकि यहाँ की जनता सब कुछ भूल जाना ही जानती है देश और सरकार यूँ ही चलता रहती है अंत में आपने समस्या को अच्छी तरह प्रस्तुत किया है इसके लिए आपको बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

दीपक जी ,हम भारतीयों पर गाँधी जी की छाप अच्छी चीजों में हो या न हो हाँ पर एक चीज में कुछ ज्यादा ही है खास तौर से '' एक गा्ल पर कोई थप्पड़ मारे तो दूसरा गा्ल भी आगे कर दो '' और यह जनता में ही नहीं बल्कि नेताओं और सरकार में भी है । हमारी सरकार शायद भूल गयी होगी पर वे शहीदों की विधवा या बहनें आज तक नहीं भूलीं कि कारगिल वॉर भी इन्ही नवाज शरीफ के वक्त हुई थी जब अटल बिहारी बाजपेई को दोस्ती के बहाने पाक बुलाया था और फिर कमर में छुरा भौंका था । आज सरकार पाक से फिर से दोस्ती के हाथ बढ़ाकर कारगिल की विधवाओं के जख्मों पर नमक छिडकने का काम कर रही है । चाहे भाजपा हो चाहे कांग्रेस सभी मतलब परस्त हैं उन्हें जनता की परेशानियों से कोई सरोकार नहीं

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

बहरहाल चुनाव में असल तस्वीर पर से पर्दा जनता को ही हटाना है और चुनावी नतीजे ये साफ कर देंगे कि जिस आम आदमी के सहारे अरविंद केजरीवाल भ्रष्टतंत्र को बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं उस आम आदमी के दिल में केजरीवाल जगह बना पाए हैं या नहीं..? सबको आइना दिखाना तो जनता का ही काम है ... अब अगर मोदी बनाम राहुल, आईपीएल बनाम पुअर का पैमाना ही चलने वाला है तो आम आदमी की परवाह कौन करता है. किसी को मोदी मंत्रमुग्ध करते है तो राहुल बजाज को राहुल ही रंजन करने वाले लगते हैं अब फैसला तो आम आदमी ही न करेगा किसान का बेटा मुलायम या नितीश या फिर बामपंथी पार्टियाँ कुछ अलग कर दिखाएंगी. सब कुछ भविष्य के गर्भ में है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यह बात तो समझ में आती है कि अडवानी जी को इस बात का एहसास हुआ है कि भाजपा से जनता का मोहभंग हुआ है. मुझे याद आता है की एकबार अडवानी जी नें कहा था की भाजपा का कांग्रेसीकरण हो चुका है. समझ के बाहर की बात यह है कि अडवानी जी की आँखों के सामने भाजपा का पतन होता रहा और वे धृतराष्ट्र की भान्ति आंख मूंदे चुप चाप देखते रहे भाजपा से मोहभंग होने के कारण मैनें अभी हाल में पोस्ट किये गए अपमे लेख में गिनाये हैं जो निम्न लिखित है,. आवश्यकता है एक बेहतर, विश्वसनीय विकल्प की अभी हाल में संपन्न तीन विधानसभाओं गुजरात, उत्तराखंड, और हिमाचल के चुनाव परिणाम के संकेत भ्रमित करने वाले हैं. 2 G, CWG, मुंबई की आदर्श सोसाइटी घोटालों के कारण यू पी ए की छवि बहुत धूमिल हो चुकी है। इसके बावजूद उत्तराखंड और हिमाचल में कांग्रेस की जीत अप्रत्याशित ही कही जायेगी। गुजरात में ही नरेन्द्र मोदी की जीत व्यक्तिगत लगती है। नरेन्द्र मोदी की कार्यकुशलता, ईमानदारी निसंदिग्ध है। मतदाता नें इस बात का संज्ञान लिया है और अगले पांच साल के लिए गुजरात की बागडोर उनके हाथ में सौंपी है। नरेन्द्र मोदी के बगैर बी जे पी की क्या हालत होती इसका अनुमान लगाना कठिन है। सबसे आश्चर्य इस बात का है कि उत्तराखंड में मतदाता ने जनरल खण्डूरी जैसे कुशल प्रशासक, सक्षम एवं स्वक्ष छवि वाले व्यक्ति को नकार दिया। केन्द्रीय वाजपायी सरकार में जनरल खंडूरी की प्रशासनिक क्षमता,ईमानदारी, कार्यकुशलता पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी कई बार इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल होता है की मतदाता चाहता क्या है। इन चुनाव परिणामों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई है। बहुत से राज्यों में द्विदलीय शासन प्रणाली लगभग स्थापित हो चुकी है, जहां भाजपा और कांग्रेस केवल दो दल ही मैदान में हैं। ऐसे में मतदाता की निगाह में दलों की छवि निर्णायक होगी। कुछ बात है जिस पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या कारण है कि कांग्रेस की धूमिल छवि के बावजूद मतदाता उसपर विश्वास करने को तैयार है। भाजपा के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते थे कि भाजपा ‘ पार्टी विद अ डिफ़रेंस ( party with a difference ) ‘ यानी कि भाजपा एक सबसे अलग छवि वाली पार्टी है। बंगारू लक्ष्मण की कारगुजारी और अभी हाल में उत्तर प्रदेश में कुशवाहा जैसे अपराधी पृष्ठभूमि के लोगो द्वारा पार्टी में प्रवेश के प्रयत्नों से पार्टी की छवि धूमिल हुई है। नेताओं की आपसी खींचतान से आज भाजपा ‘ party with a difference ‘ की जगह ‘ party with differences ‘ कहलाने लगी है। स्वयं अडवानी जी के शब्दों में भाजपा का कांग्रेसीकरण हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस में बहुत थोडा अंतर रह गया है। कांग्रेस की तुलना में भाजपा की कमीज अब उतनी सफ़ेद नहीं रह गई है जितनी कि कभी होती थी। कुछ ऐसे अज्ञात कारण हैं कि मतदाता कांग्रेस को सभी बुराइयों के साथ स्वीकार करने को तैयार है लेकिन भाजपा को बेदाग़ देखना चाहता है। भाजपा को इस बात को समझना होगा और अपने को इसी अपेक्षा के अनुरूप ढालना होगा। कहने का मतलब है की भाजपा को कांग्रेस की तुलना में एक स्वक्ष, समर्पित, बेहतर विकल्प देना होगा, तभी मतदाता इसकी ओर आकर्षित होगा। अगर कांग्रेस का ही दूसरा संस्करण बनना है तो कांग्रेस क्या बुरी है। इसके अतिरिक्त जब देश में 2 G, CWG, कोयल खनन घोटालों के विरुद्ध अन्ना, केजरीवाल के जन लोकपाल , बाबा राम देव के जन आन्दोलन चल रहे थे तब भाजपा लकवाग्रस्त नज़र आ रही थी. भाजपा नें अपनी विपक्षी दल की भूमिका का निर्वाह नहीं किया.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

अफजल की फांसी पर अगर इसी तरह चर्चा होती रही तो अफजल सरीखे देश द्रोहियों को बल मिलेगा, ऐसी वारदात को अंजाम देने के लिए! ऐसा मेरा अपना स्वतन्त्र विचार है अब रही बात जम्मू कश्मीर के युवा मुख्य मंत्री के बयां की तो उनका क्या है वे मुख से केंद्र सरकार का समर्थन करते हैं पर दिल से अफजल जैसे देश द्रोहियों की हिमायती भी करते हैं ये उनकी प्रदेश की राजनीती में बने रहने के लिए शायद जरुरी हो और यासीन मालिक साहब तो कश्मीर को आजाद कश्मीर देखना चाहते हैं इसी के चलते वे अपने पडोसी दुश्मन मुल्क के आतंकी हाफिज शयीद के साथ मंच साझा करते दिखाई देते हैं उनको पाकिस्तानियों पर भरोसा है की आज नहीं तो कल हम पाकिस्तानियों की मदद से कश्मीर को आजाद करा लेंगे वैसे भी अगर आप श्रीनगर जाएँ तो वहां के आम लोग आपको यह कहते हुए मिलेंगे "क्या आप हिंदुस्तान से आये हो?"जैसे श्रीनगर तो हिंदुस्तान का हिस्सा ही ना हो ! मैंने खुद से ऐसा सुना है सन ८६ में और प्रतिक्रिया वश , मैंने पूछा और आप! कहाँ के रहने वाले हो ? तो जवाब था हम कश्मीरी हैं . जब वहां की आवाम अपने को भारतवर्ष का हिस्सा नहीं समझते फिर हमारे राजनेता किस बिना पर दम भरते हैं उनसे किसी वफ़ादारी का शायद मेरे इस बात से कोई ऐसा मतलब निकाले की मैं देश विरोधी बात कर रहा हूँ तो यह उसकी सोंच कही जाएगी मैं तो यह अपना अनुभव बता रहा हूँ अब किसने अफजल की फांसी पर ख़ुशी मनाई किसने जनाजे की नमाज अदा की यह सब तो देश के बड़े बड़े नेताओं को सोचना है जो आये दिन साम्प्रदायिक सद्भाव देश का बिगड़ना चाहते हैं और हमेशा देश की अवाम को बांटे रखना चाहते हैं और कमाल तो यह है की ये नेता किसीके नहीं केवल अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं और जनता की गाढ़ी कमाई पर ऐश मौज कर रहें हैं और लोगों को आपस में लड़ाकर देश को कमजोर कर रहें हैं अतः अब वक्त आ गया है की अफजल को जैसे दफ़न कर दिया गया है वैसे हीं इस चर्चा को भी दफ़न कर दिया जाये वरना बहुत जल्द कोई और अफजल खड़ा हो जायेगा

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

प्रिय दीपक जी, सादर अभिवादन! आपकी चिंता जायज है, किसी भी आन्दोलन के लिए एक सशक्त और इमानदार नेता की जरूरत होती है! अन्ना इमानदार तो है पर उनमे नेतृत्व क्षमता की कमी दीखती है! पहले अरविन्द केजरीवाल ने उनका इस्तेमाल किया अब किरण बेदी और जनरल वी के सिंह कर रहे हैं. ये सभी अपनी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ नहीं पा रहे हैं! इनमे आपसी सामंजस्य का अभाव है. साथ ही सत्ता का दुरुपयोग इनके आंदोलनों को ध्वस्त करने में कामयाब रहा. केजरीवाल अभी भी जी जान लगाकर जूझ रहे हैं. वे निडर होकर अपनी जंग जारी रखे हुए हैं ... अब तो इंतज़ार है कि उनका संगठन आगामी समय में कितना आगे बढ़ पाता है ...आम जनता परिवर्तन तो चाहती है ..विकल्प तो सामने आये! अगर विकल्प एन डी ए और यु पी ए में से ही किसी एक को चुनना है तो भी परिवर्तन की उम्मीद तो की ही जा सकती है! ....मीडिया भी निष्पक्ष रहा नहीं. वह भी अपनी दुकान चलाने के लिए कभी इधर तो कभी उधर झुकती ही दीखती है! आगे उम्मीद पर दुनिया कायम है! परिवर्तन की आश छोड़नी नहीं चाहिए! ....आप की लेखनी काफी सक्रिय है, जन जागरण करते रहें, यह मेरी राय है! साभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

जाहिर है लोकपाल की राह में सबसे बड़ा रोड़ा सरकार ही है..! सरकार नहीं चाहती कि एक सशक्त लोकपाल आए..! हो सकता है कि बजट सत्र में संशोधित लोकपाल बिल पास भी हो जाए क्योंकि संसद में सशक्त लोकपाल के समर्थन में आवाज उठाने वाला कोई नहीं है क्योंकि विपक्ष में बैठे लोग ये जानते हैं कि कभी न कभी वे भी सत्ता में आएंगे ऐसे में सशक्त लोकपाल एक दिन उनके गले की फांस भी बन सकता है..! तो क्यों वो इसके पक्ष में आवाज बुलंद करेंगे..?बिलकुल सहमत हूँ आपकी बातों से ! संसद में सशक्त लोकपाल के समर्थन में आवाज उठाने वाला कोई नहीं है क्योंकि विपक्ष में बैठे लोग ये जानते हैं कि कभी न कभी वे भी सत्ता में आएंगे ऐसे में सशक्त लोकपाल एक दिन उनके गले की फांस भी बन सकता है..! तो क्यों वो इसके पक्ष में आवाज बुलंद करेंगे..?,बढ़िया पोस्ट, हर एक को अपना भविष देखना है

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

Surprising! 77.5% of population is fighting against 22.5%. ST and ST are only 22.5% and they also are demanding only 22.5% of higher posts for them . Horrible! persons are so mad behind up liftment of centuries oppressed class. The so called upper castes are so much terrorized of SC and ST. Let us analyse the situation. The 77.5% of higher posts are still going to upper castes if reservation to SC and ST is granted in promotions.The dissatisfied group in upper castes will only be 22.5%.It simply means that only those who are very in low merit should not be able to reach the height they wish. Now the important talked about is merit. At least in India at present 80% meritorious students wish to become IITian and thereafter seek lucrative jobs in foreign countries. Government job is last choice. It is mediocre who seek Government service. Among those who are lowest in merit wait for their turn after passage years to get higher post. The persons with low IQ , less meritorious and inefficient in work pleaders of seniority. yes no one will deny that only most able persons should reach on the higher posts. Let the promotion seekers to each and every higher post be subjected to written test conducted by Union Public Service Commission The minimum Qualification (educational,professional/technical, published research work) be prescribed for appearing in test. He must apprise his own work and such appraisal be put up to the committee of experts. The persons outstanding in merit be given higher post. We can allot some grace marks to SC,ST and OBC category persons. It is disgraceful to meritorious person to see a non meritorious and inefficient person on his head simply because he is elder in age. Mr tiwari come on. Let us fight for Merit irrespective of caste and age.

के द्वारा: rdverma1 rdverma1

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

के द्वारा: abhijeettrivedi abhijeettrivedi

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

अंशुमन जी नमस्कार और धन्यवाद, हो सकता है कि आप मेरी बात से सहमत न हों लेकिन इस बात से तो आप इंकार नहीं कर सकते कि नारायण दत्त तिवारी की पहचान उत्तर प्रदेश से ही थी...और उत्तर प्रदेश जहां धर्म और जाति की राजनीति चरम पर रहती है...उस प्रदेश के सीएम की कुर्सी पर तीन तीन बार विराजमान होना किसी आम राजनीतिज्ञ के बस का तो नहीं है...उस नेता के बस का ही हो सकता है जिसका बड़ा राजनीतिक आधार हो..और उसके समर्थक हों...और यूपी में जहां ब्राह्मणों की तादाद अच्छी खासी है तो एनडी तिवारी को भी जाहिर है कि इसका फायदा निश्चित तौर पर मिला होगा। मैं ये नहीं कह रहा कि वे ब्राह्मणों के सर्वमान्य नेता हैं...लेकिन ये जरूर मानता हूं कि ब्राह्मण वोटर्स पर उनका प्रभाव जरूर है...शायद यही वजह है कि यूपी में 23 साल तक ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने शासन किया...जिसमें एऩडी तिवारी भी शामिल हैं।

के द्वारा: TIWARI DEEPAK TIWARI DEEPAK

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

संसद देश की सबसे बड़ी पंचायत है. वहाँ बहस नहीं होगी तो कहाँ होगी. बहस तो होनी ही चाहिए. लेकिन बहस सार्थक होनी चाहिए. उसका कोई नतीजा निकलना चाहिए. निरर्थक बहस जो समय बर्बाद करने के लिए की जाती है, उसका कोई औचित्य नहीं है. देखने में आता है कि कई बार बहस तू तू मैं मैं और गाली गलौज में बदल जाती है. उसका मकसद हो जाता है विपक्षी को नीचा दिखाना, अपने वोट बैंक को प्रभावित करना इत्यादि. Purposeful बहस बहुत कम देखने में आती हैं. जन लोकपाल बिल पर बहस निरर्थक ही रही. हद तो हो गई राज्यसभा में जहाँ बिल की प्रति राजनीति प्रसाद से फड़वा दी गई और अध्यक्ष महोदय नें पुनर्नियोजित तरीके से बैठक स्थगित कर दी. राज्यसभा को उस पर विचार करने का मौका ही नहीं दिया गया. इन हरक़तों से संसद की विश्वसनीयता समाप्त होती है. क्या ऐसी ही बहस होनी चाहिए.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

मनीषा जी नमस्कार और बहुत बहुत शुक्रिया, आपकी बात का मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा...मैं भी आपकी इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूं कि किसी भी चीज का सही इस्तेमाल होना चाहिए...औऱ बैन करना इसका हल नहीं है। मैंने अपने लेख में दरअसल ये लिखने का प्रयास किया है कि अगर सोशल नेटवर्किंग साइट्स में अपनी बात अभिव्यक्त करना अपराध है....तो इसे बैन करना चाहिए....ये एक परिस्थितिवश उपजा सवाल है...जिस पर मैंने भी इस सवाल को उठाया। आपने उत्साह बढ़ाने के साथ ही मार्गदर्शन किया इसके लिए एक बार फिर से आपका बहुत बहुत शुक्रिया...उम्मीद करता हूं भविष्य में भी इसी तरह आप उत्साह बढ़ाने के साथ ही मार्गदर्शन करती रहेंगी। धन्यवाद

के द्वारा: TIWARI DEEPAK TIWARI DEEPAK

आदरणीय प्रयास जी , आपका लेख '' भारत में बैन हों सोशल नेटवर्किंग साइट्स '' पढा । प्रयास जी जब से विज्ञान ने प्रगति की है तब से हमारे समाज में ऐसी बहुत सी बातें हैं जो हमारे समाज को बहुत समय से नुकसान पहुंचा रही हैं जैसे नेट ,सोशल नेट वर्किंग ,सिनेमा ,कुछ मैग्जीन्स ,टेलीविजन ,मोबाइल और न जाने क्या क्या ? यह सब चीजें सिर्फ बड़ों को ही नुकसान नहीं पहुँचातीं बल्कि नाबालिग बच्चों और युवाओं के लिए भी किसी खतरे से खाली नहीं हैं जैसे नेट पर फ्री पोर्न साईट या पहले वक्त में चलतीं मैगजीन्स । अब आप मुझे बताएं कि आप समाज में किस किस पर बैन लगाएगें । प्रयास जी मेरे ख्याल से कुछ भी बुरा नहीं है बस इन्सान को उनका सही इस्तमाल करना आना चाहिए । प्रयास जी आप बहुत अच्छे लेख लिखते हैं । मैंने आपके लेख पढ़े हैं अगर आप बुरा नहीं मानें तो मैं एक बड़ी बहन होने के नाते आपको एक मशवरा देना चाहूँगी कि आप कोई भी लेख लिखने से पहले उस लेख पर अपनेआप से ही तर्क वितर्क करें और ऐसे लेख लिखने का प्रयास करें कि कोई भी लेखक आपके लेख की काट न कर पाये उम्मीद करती हूँ कि आपने मेरी बात का बुरा नहीं माना होगा , मेरा प्रयास युवा लेखकों को सदा आगे बढ़ते देखना है ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

पारिस्थितिक दृष्टिकोण पर आधारित पठनीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! "राजनीति में सियासी दलों और नेताओं की चाल, चरित्र और चेहरे कैसे बदल जाते हैं, इसका अंदाजा गडकरी के मामले से आसानी से लगाया जा सकता है। गडकरी पर उठी एक ऊंगली ने गडकरी को अर्श से फर्श पर पहुंचाने की पूरी रूप रेखा तय कर दी…जो पार्टी अपने निजाम के साथ कदम से कदम मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरु करने का दम भरते हुए सत्ता में लौटने का ख्वाब देख रही थी…उस पार्टी के निजाम ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए तो ऐसा होना ही था। लेकिन आखिर में दिनभर की जद्दोजहद के बाद आखिरकार भाजपा ने खुद ही गडकरी को क्लीन चिट देते हुए गडकरी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा होने का ऐलान करने के साथ ही गडकरी के इस्तीफे की अटकलों को खारिज कर दिया। सवाल ये भी है कि जो पार्टी विपक्ष में रहते हुए विरोधियों पर आरोप लगने पर उनके इस्तीफे की मांग करती है वो पार्टी अपने ऊपर बात आने पर अपने नेता को पूरा संरक्षण देते हुए खुद ही उसे क्लीन चिट दे देती है।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: TIWARI DEEPAK TIWARI DEEPAK

आदरणीय पीतांबर जी नमस्कार,                                            मनमोहन सिंह साहब हिंदी तो जानते हैं...लेकिन हिंदी बोलने से कतराते क्यों है फिर....एक तरफ हिंदी हमारी राजभाषा है दूसरी तरफ हमारे देश के शीर्ष नेता हिंदी बोलने से कतराते हैं...अंग्रेजी में ही बात करते हैं, भाषण देते हैं और तो और संसद में भी अंग्रेजी का ही इ्स्तेमाल करते हैं। ये इनका कैसा हिंदी प्रेम है मेरी समझ से तो परे है....और मैं आपकी इस बात से तो कतई समहत नहीं हूं की मनमोहन सिंह बहुत अच्छी तरह से हिंदी बोल लेते हैं। कभी मौका मिले तो गौर कीजिएगा मनमोहन सिंह साहब कितनी अच्छी हिंदी बोलते हैं। 

के द्वारा: TIWARI DEEPAK TIWARI DEEPAK

जहां तक खाप पांचायतों की बात है तो खाप के पूर्व में अलग अलग मामलों में आने वाले फैसलों में कहीं न कहीं महिलाओं को रुढ़ीवादी परंपराओं में बांधने पर विश्वास रखते हैं ऐसा प्रतीत होता है। जो स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को बाधित तो करते ही हैं…साथ ही स्त्रियों के सामाजिक औऱ शैक्षिक विकास को भी बाधित करते हैं…ऐसे में ओम प्रकाश चौटाला जैसे राजनीतिज्ञ जो खाप पंचायतों के फैसलों का समर्थन करते हैं कहीं न हीं उनकी विचारधारा पर भी संदेह होता है कि क्या कोई पूर्व मुख्यमंत्री भी स्त्रियों के सामाजिक और शैक्षिक विकास की बजाए उनकी आत्मनिर्भरता को बाधित कैसे कर सकता है…लेकिन ओम प्रकाश चौटाला के मामले में तो यही प्रतीत होता है। जहां तक कम उम्र में लड़कियों के विवाह की बात है तो निश्चित ही कम उम्र में विवाह लड़कियों के अधिकारों और उनकी अपेक्षाओं के साथ अन्याय प्रतीत होता है क्योंकि हर लड़की वो भी आज के समय में पढ़ना चाहती है और देश दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रही लड़कियों-महिलाओं की तरह बनना चाहती है…लेकिन परिजनों औऱ नाते रिश्तेदारों के दबाव में कम उम्र में विवाह उनके अधिकारों पर अतिक्रमण तो है ही ! ये केवल एक राजनीतिक ड्रामा है ओमप्रकाश का ! उस का भी शाशन हरियाणा के लोगों ने देखा है , चूस के रख दिया उसके लोगों ने हरे भरे हरियाणा को ! सरकार बदलने से कुछ नहीं होने वाला , लोगों के मन बदलने चाहिए !

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श्रद्धेय पीताम्बर जी ,..सादर प्रणाम ओसामा के जीजा जी से सहमत होने के लिए सादर साधुवाद ,...क्या कभी आपने उनके विचारों पर द्रष्टिपात करने का कष्ट किया है ?....उनको मान देने वाले गलत आदमी हो सकते हैं ,..लेकिन राक्षसी और लुटेरी तानाशाह सत्ता की खिलाफत में अपना मान सम्मान सबकुछ दांव पर लगाने वाले राष्ट्रसेवक का अपमान करने वालों के आदमी होने पर भी सवाल पैदा होता है !!...रहा सवाल उनके गुरु श्री शंकरदेव का तो उनसे स्वामी रामदेव को सदा ताकत ही मिली है ,..यदि होते तो आज भी बल ही देते ,..शेष कांग्रेसी सत्ता है ,...भगत सिंह से लेकर आजाद ,.सुभाष बोस ,..श्यामाप्रसाद मुखर्जी ,..शास्त्री जी ,..राजेश पाइलट ,...माधवराव सिंधिया ,..जितेन्द्र प्रसाद जैसे बहुतों की मौत का एक सिरा आनंद भवन से लेकर दस जनपथ तक जुड़ा है ,..आभार सहित

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श्री दीपक जी , बाबा रामदेव के प्रोडक्ट में काफी दिनों से गड़बड़ी खोजी जा रही है , इस विषय पर कुछ दिन पहले खुलासा हुआ था की कुछ विरोधी उनके कर्मचारियों को लाखो करोडो रुपये का लालच देकर उनके कंपनी के काम काज में गड़बड़ी फैलाना चाहते है क्योकि बाबा रामदेव की निगाह कंपनी में हर जगह तो नहीं जा रही है , अतः पूरी संभावना है की कुछ कर्मचारी इन पैसो के लालच में ये काम शुरू कर दिए हो .. पर मुद्दे की बात ये है की जो बाबा पुरे देश में राष्ट्रवाद फैलाना चाहता है वो अपने संगठन में काम कर रहे लोगो में में ये भावना नहीं उत्पन्न कर प् रहे है , रही बात बाबा के संपत्ति की तो सायद आप सतही ज्ञान रख रहे है , जिस ११०० करोड़ की बात आप कर रहे है उसके अनतर्गत कुल संपत्ति का मूल्य मापा गया है न की की उनकी कमाई या मुद्रा ... क्योकि मै व्यक्तिगत रूप से बाबा के परिवार को भी जनता हु उनके पिता जी और भाई आज भी टूटे फूटे मकान में ही रह रहे है , और स्वयं बाबा का तो कोई परिवार है नहीं , और कोई देश सेवा करने के लिए देश लूटेगा नहीं ......ऐसा मेरा मानना है ...

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दीपकजी अपने ज्ञान कि ज्योति फैलाते रहो और अपनी लेखनी से समाज को जाग्रत करते रहो | हमने देखी है प्रोन्नति नौकरी में, आउट स्टेंडिंग होगये आउट | अरक्षित हो आगे आ गये रक्षितों को कर दिया आउट | एक तो पुलिस कि नौकरी, कोई सुने ना 'यस सर' कि फरियाद | अनुशासन के नाम पर, ना असूल ना मूल अधिकार | ना कोर्ट ना कचहरी कहाँ जायें, बस रगड़ दिया होशियार | सड़क से संसद तक ही क्यों, जल्द पहुंचेंगे संसद से सड़क तक | यह सोचते हैं की जनता भूल जायेगी, पर यह जो पुब्लिक है सब जानती है | बोतल से निकला आरक्षण का जिन्न कहीं कांग्रेस के वोट को ही खा जाये | कहावत है " ना माया मिली ना राम, प्रोन्नति से हाथ का वोट भी गया | विनाश काले विपरीत बुद्धि, अब क्यों ले जनता तुम्हारी सुधी | फसली बटेरे भाग जायेंगे, बस हाथ मलते रह जायोगे | " अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टेक सेर खाजा " पैसा, टक्का, चवन्नी अठन्नी रही नहीं, रूपवाला रूपया की भी उकात नहीं | जल्द बजेगा भ्रष्टाचारियों का बाजा और निकलेगा भ्रष्टाचार का ज़नाज़ा | हाँ कुछ कर के दिखाना होगा, कुछ खून बहाना होगा | पत्थर के हाथी ना काम के ना काज के, कर्नाटक का घोडा सवारी के लायक नहीं,| हाथ को हाथ दिखा बिछड़े सभी बारी बारी क्या आई साईकल के पीछे बैठने की बारी |

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ऐसा में हमारे नेताओं को ये सोचना चाहिए इस पर मंथन करना चाहिए कि आखिर असीम त्रिवेदी को विवादित कार्टून बनाने की जरूरत क्यों पड़ी…भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों को आवाज़ उठाने की जरूरत क्यों पड रही है…बजाए इसके की बेवजह की बातों पर बयानबाजी करें औऱ अपने साथी राजनेताओं पर कीचड़ उछालें। राजनेता अगर इस पर मंथन करें और सिर्फ ये सोचें की देश की जनता का कल्याण कैसे होगा…देश से गरीबी, भूखमरी कैसे दूर होगी…देश से बोरोजगारी कैसे हटेगी…भारत विकासशील देश से विकसित राष्ट्र कैसे बनेगा तो शायद किसी असीम त्रिवेदी को किसी का कार्टून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी…भविष्य में कोई और दूसरा असीम त्रिवेदी पैदा ही नहीं होगा…और कार्टून बनाने पर अपनी बात अभिव्यक्त करने पर किसी असीम त्रिवेदी सरीखे कार्टूनिस्ट पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं होगा। असीम त्रिवेदी जैसे लोगों के पैदा होने से मुझे लगता है की व्यवस्था और अभिव्यक्ति में बढोत्तरी ही होगी इसलिए ऐसे लोगों को हमेशा और हर युग में पैदा होना चाहिए जो सच को सच कह सकें !

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राजनीति करने वालों में ऐसा कोई भला मानुष बताइये जिसकी बखिया नहीं उधेडी जा सकती? आपने मायावती का नाम लिया क्योंकि वे प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन करती हैं- यह ज़रूरी है की अनुसूचित जाति, जन-जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाए क्योंकि वे जिस भी विभाग में नौकरी करते हैं वहां उच्चा पदों पर पहले से आसीन तथाकथित उच्च वर्ग के लोग उन्हें आगे बढ़ने नहीं देते, इस बात का एक नहीं सैकड़ों-हज़ारो उदाहरण दिए जा सकते हैं, आप स्वयं किसी भी विभाग के उच्च पदों पर आसीन लोगों के नाम की सूची तैयार कर लें तत्पश्चात निर्णय लें ....बाकी मुलायम कौन से दूध के धुले हैं....सबसे ज्यादा गुंडाराज मुलायम के शाशनकाल में ही होता है, बेरोजगारी भत्ते का लालच यही देते हैं, कन्या विद्याधन, का लालच देते हैं, लैपटॉप का लालच दिया है, कोंग्रेस ने तो घोटालों का रिकोर्ड तोड़ दिया है, भाजपा को राम मंदिर और मुस्लिम विरोध के अलावा कुछ सूझता ही नहीं हैं, हिन्दू-मुस्लिम दंगों में भी इनकी संलिप्तता साबित हो चुकी है...अब सबको पकड़-पकड़ के उनकी बखिया उधेड़ने में कई महीने बीत जायेंगे लेकिन राजनीति करने वालों के कारनामे ख़त्म नहीं होंगे....इसलिए देखना है तो सबको देखो....लिखना है तो सब पर लिखो वो भी निष्कपट होकर.....बाकी जाति-धर्म कहाँ से प्रकट हुयी और कब तक इसे बनाए रखना है इस बात पर यदि कुछ लिख सको तो लिखो......

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बहरहाल मायावती भले ही इसके पीछे वर्ग विशेष के पिछडेपन का हवाला देते हुए उनके उत्थान और विकास का तर्क दे रही हों…लेकिन ये माया भी अच्छी तरह जानती हैं कि उनके बगैर वो भी कुछ नहीं है…लिहाजा आवाज तो बुलंद करनी ही होगी…क्या पता इसका इसी बहाने इसका फल इससे लाभांवित होने वाले वर्ग विशेष माया को 2014 के आम चुनाव में दे दे। जो शायद उत्तर प्रदेश विधानसभा में करारी मात के माया के जख्मों को भी कुछ हद तक भरने में सफल हो जाए। खैर माया की मंशा कब पूरी होती है…या कहें कि होती भी है कि नहीं..ये तो भविष्य के गर्भ में है…लेकिन माया ने दिखा दिया कि अपने वोटबैंक को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है…कैसे साधा जा सकता है। माया तो सिर्फ एक उदाहरण हैं…वोटबैंक की राजनीति के चलते अपने फायदे के लिए अजब – गजब कारनामे और किसी भी हद तक जाने वाले तो इतिहास के पन्नों में भी हमें कई मिल जाएंगे…लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे देश की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है…वो चीजों को जल्दी और आसानी से भूल जाते हैं…या यूं कहें कि याद ही नहीं रखना चाहती। सच कहूं तिवारी जी आपने मेरे दिल और दिम्माग को पढ़ लिया है शायद ! स्पष्ट रूप से मैं यही कहना चाहता था किन्तु समय ने अनुमति नहीं दी और अपने शब्द आपकी लेखनी में देख रहा हूँ ! बहुत सटीक लेखन !

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पासवान जहां बिहार में दलित वोटबैंक के सहारे अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं तो मायावती भी विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद कम से कम 2014 के आम चुनाव में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर नीला झंडा फहराना चाहती हैं…और मायावती की कोशिश भी यही होगी कि इस बार अपनी सीटों की संख्या 21 से बढ़ाकर कम से कम 30 से 40 की जाए…ताकि केन्द्र की राजनीति में माया का कद बढ़े। चलो ये तो थे तर्क प्रमोशन में आरक्षण बिल का पुरजोर समर्थन करने वाले दो दलों के…अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी की आखिर क्यों सपा प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में है। सपा इसके पीछे भले ही जो भी तर्क दे…लेकिन इस बात से सपा के नेता इंकार नहीं कर सकते कि इस फैसले के विरोध के पीछे 2014 के आम चुनाव ही हैं। सपा ये बात जानती है कि अगर वो इस फैसले का पुरजोर विरोध करेगी तो देशभर में न सही कम से कम उत्तर प्रदेश के उन समान्य वर्ग के उन 16 लाख सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार के साथ ही सामान्य वर्ग के दूसरे लोगों की सहानुभूति तो वो आम चुनाव में बटोर ही सकती है। आपने स्पष्ट लेख लिखा है ! असल में कोई किसी का भला नहीं करना चाहता , सब अपनी ज़मीन पक्की करना चाहते हैं ! बढ़िया लेख

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के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

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दीपक जी, राजनीति करने वालों की मंशा और विचारों का सटीक चित्रण किया है आपने... बाकी बिलगेट्स की बात भी काफी हद तक सही है, क्योंकि गरीब पैदा हुआ इंसान अमीर बन सकता है लेकिन उसके लिए उसकी बहुत सी आधारभूत ज़रूरतों का पहले पूरा होना ज़रूरी है, अधिक प्रतिभावान व्यक्ति तो किसी भी परिस्थिति में खुद को साबित कर सकता है, लेकिन यहाँ बात अधिक से अधिक संख्या वाले सामान्य प्रतिभा एवं क्षमता के लोगों की है....जब तक उनकी आधारभूत ज़रूरतें ही पूरी नहीं होंगी तब तक वे आगे नहीं बढ़ सकते......अमीर बाप के सामान्य बुद्धि के बच्चे भी अपनी दूकान खोल कर सामान्य बुद्धि और क्षमता के सहारे उसे चला लेंगे....लेकिन गरीब बाप के सामान्य बुद्धि और क्षमता के बच्चों को मजदूरी ही करनी पड़ेगी.....या फिर उन्हें सस्ती शिक्षा और उसके बाद जल्दी नौकरी या फिर सस्ती दरों पर आसानी से लोन मिल सके....एक कहावत है न "जिस तन लगे वही तन जाने" बड़ी-बड़ी बातें करना दूसरों को नसीहत देना आसान होता है, लेकिन हकीकत वही जानता है जिस पर गुजरती है! आशा है मेरी बात को आप निष्पक्ष होकर समझने की कोशिश करेंगे....

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बी जे.पी का आचरण उस कमजोर बच्चे जैसा है जिसका न तो स्वास्थ्य ठीक है और न ही शरीर (विकलांगता की सीमा को पार कर चूका है )प्रिय तिवारी जी आपका सवाल सही है , कांग्रेस भी पूरी तरह से स्वास्थ्य नहीं है परन्तु चूँकि सत्ता की लाठी उसके हाथ में है इसलिए कुछ ताकत बाकी है इस लिए भाजापा का इरादा यह है की अगर सत्ता नहीं भी मिलेगी फिर भी कांग्रेस का खेल तो बिगड़ ही जाएगा इस लिए मध्यावधि चुनाव की दरकार है /या आप इसको दुसरे शब्दों में यूँ कह सकते है की भाजपा की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी किसी बाल ब्रहमचारी की शादी जबरन कर दी जाय और बाल बच्चे होने के बाद ७ वर्ष के पश्चात उसकी पत्नी रूठ कर मायेके चली जाय तो कोई भी विवाहित व्यक्ति ऐसी स्थिति की विवेचना स्वयं ही कर सकता है एक बाल ब्रहम चारी विवाहित होकर बच्चे पैदा करके भी अविवाहित जैसा जीवन बिताने पर मजबूर हो ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

प्रिय तिवारी जी आपका सवाल सही है , बी जे.पी का आचरण उस कमजोर बच्चे जैसा है जिसका न तो स्वास्थ्य ठीक है और न ही शरीर (विकलांगता की सीमा को पार कर चूका है ) कांग्रेस भी पूरी तरह से स्वास्थ्य नहीं है परन्तु चूँकि सत्ता की लाठी उसके हाथ में है इसलिए कुछ ताकत बाकी है इस लिए भाजापा का इरादा यह है की अगर सत्ता नहीं भी मिलेगी फिर भी कांग्रेस का खेल तो बिगड़ ही जाएगा इस लिए मध्यावधि चुनाव की दरकार है /या आप इसको दुसरे शब्दों में यूँ कह सकते है की भाजपा की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी किसी बाल ब्रहमचारी की शादी जबरन कर दी जाय और बाल बच्चे होने के बाद ७ वर्ष के पश्चात उसकी पत्नी रूठ कर मायेके चली जाय तो कोई भी विवाहित व्यक्ति ऐसी स्थिति की विवेचना स्वयं ही कर सकता है एक बाल ब्रहम चारी विवाहित होकर बच्चे पैदा करके भी अविवाहित जैसा जीवन बिताने पर मजबूर हो ? धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

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के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

ऐसी आलोचना करना बहुत ही आसान है लेकिन क्या जितना कुछ ये लोग कर रहे हैं उसका एक प्रतिशत भी आप और हम कर सकते हैं? इनसे बेहतर इस देश मे कोई और हो तो उसका परिचय दीजिये,उसी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ी जाये। समय मिले तो इस लिंक पर क्लिक कर लें... http://ajaykumarsingh.jagranjunction.com/2012/08/26/%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%88/ यदि कुछ और समय हो तो इस पर भी गौर फरमायें.. अवसर बार बार दस्तक नहीं देता है। स्वतंत्र भारत में इससे बड़ा और इससे सफल आन्दोलन अब तक नहीं हुआ है। यह अब निर्णायक दौर में है। हम लोगों को अपना दर्शन बघारने का,बुद्धजीवी बनने का,अच्छा लेखक बनने का बहुत अवसर आयेगा किन्तु देश के लिये इतनी बड़ी सेवा का अवसर कदाचिद ही मिले। कोई सिद्धान्त,नियम,दर्शन,निर्णय या व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसकी आलोचना के लिये मसाला न मिल सके। शब्दों के जाल से जन साधारण में संदेह पैदा करना कठिन नहीं है,इस कार्य के लिये अब तक राजनीति करने वाली कम्पनियां लगी ही हुयीं हैं। ये उत्तरदायित्व हम स्वतंत्र लोगों का है (जो लोग किसी के हाथों बिके न हों) कि इस आन्दोलन के इस निर्णायक दौर में जिस तरह भी हो सके इसे सफल बनायें।

के द्वारा: ajaykumarsingh ajaykumarsingh

के द्वारा: nishamittal nishamittal

बिल्कुल अजय जी आपने सही कहा सरकार आनशन को नजरअंदाज कर रही थी तो क्या कम से कम 8 अगस्त तक तो आंदोलन चलना ही चाहिए था...और आंदोलन चलता तो शायद सरकार पर औऱ ज्यादा दबाव बनता क्योंकि 9 अगस्त से फिर रामलीला मैदान में रामदेव का आंदोलन भी तो शुरू होना है....खैर अब अन्ना ने कहा है कि आंदोलन दूसरे रूप (राजनीति) में जारी रहेगा तो देखना होगा कि जंतर मंतर पर पहुंचने वाले उनके समर्थक, सोशल नेटवर्किंग साईटस पर महिम चलाने वाले उनके समर्थक और अपने अपने शहरों में धरना प्रदर्शन औऱ रैलियां निकालने वाले उनके समर्थक वोट के जरिए अन्ना को समर्थन देते हैं या नहीं।

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दिपक जरा गहराई से सोचो । सरकार क्यों नक्सलियो या आतंकियों को मारना चाहेगी । वो तो उन का हथियार है जनता को डराने का । भारत में डरी हुई जनता की ही जरूरत है । हां, जनता की सहानुभूती या हम कुछ कर रहे हैं ये दिखाने के लिये दोचार आदमी को मारना पडता है, तो मारते हैं, और अपने खरीदे हुए मिडिया को कहा जाता है की आप ईस घटना का विरोध करो । फीर सरकार जनता को कह सकती है की हम तो कडे कदम उठाना चाहते हैं लेकिन लोग विरोध करते हैं । आदमी मरा वो आम नागरिक था या आतंकवादी उस से सरकार को या मिडिया को कोइ लेना देना नही । सैनिक या पूलिस मरते हैं तो सरकार को या मिडिया को क्या तकलिफ । मरने के लिये तो उस नौकरी में आये थे । आज सैनिक सरहद के लिये नही नेता की कुरसी बचाने के लिये मरता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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